वो है अम्बर, तो मै हूँ धरा,
वो है सागर, तो मै हूँ एक मामूली सा घड़ा,
ये सब जब मैं समझ सकता हूँ, तो तू क्यूँ नहीं मान पाता,
तू मेरा साया हो कर भी मेरे साथ क्यूँ नहीं चल पाता,
हर चीज़ जो इंसान चाहता है, वो उसे नहीं मिलता,
जीवन के इस दस्तूर को तू क्यों नहीं समझ पाता,
तू भी जानता है कि तू मुझसे हार जाएगा एक दिन,
तो मुझसे अभी ही ख़ुशी-२ हाथ क्यूँ नहीं मिला पाता,
मैंने तो अपना जीवन नहीं रोका है,मैं तो जी रहा हूँ.
दर्द के बारे मे बिलकुल ना सोच कर मैं तो हँस रहा हूँ.,
फिर तू क्यूँ नहीं हँस पाता,मेरा हमसफ़र क्यूँ नहीं बन पाता,
मुझे तो तेरी नासमझी पर गुस्सा नहीं, अब तो तरस आता है,
तेरा साथ छोड़ के तुझसे भी दूर जाने का दिल चाहता है,
जल्दी से सब समझ कर मेरे साथ आ जा,
वरना मैं तो तुझे यहीं छोड़ के आगे बढ़ चलूँगा,
मेरी लड़ाई तो किस्मत से है, तुझसे अलग रह के भी मैं जंग जीत लूँगा,
मेरे सामने अपनी अहमियत जानकर भी तू मुझसे क्यूँ है लड़ना चाहता,
मेरे जीवन के इस पड़ाव को तू क्यूँ नहीं समझना चाहता....
have to say that your outlook is going more and more to 'inner self'...great timing for this to strike going by the current scenario...
ReplyDeleteise dubara padha liyo ....
ReplyDeleteaur kya kahu.......
http://abbhilasha.blogspot.com/2010/04/blog-post_23.html
fabulous work...keep it up!!!
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