Thursday, June 17, 2010

Meri uljhan

मैं रोना चाहता था, पर आंसू बहे नहीं,
मैं रोकना चाहता था, पर कदम आगे बढे नहीं,
चीजों को समझते-२ मैं इतना ज्यादा समझने लगा कि,
आज जब मैं  लौटना चाहता हूँ, मुझे दिल  की गवाही मिलती नहीं..
वो समय भी प्यारा था, जब मेरा दिल मेरे साथ था,
मुझे खुद  पर पूरा विश्वास था,
पर अब तो इतने मानसिक द्वन्द हैं होते कि,
जीत के भी मैं खुद को जीता हुआ मान पाता नहीं,
वो ना समझ सका मेरी इस उलझन को,
मेरी बातों, मेरी आँखों मे छुपी हुई तड़पन. को,
शायद इसीलिए आज जब मैं  ठहरना चाहता हूँ, तब ये कदम रुकते  नहीं,
मैं आज भी रोना चाहता हूँ, पर कमबख्त ये आंसू बहते नहीं..

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